Monday, August 1, 2011

अमरता


दोस्तों आज १ अगुस्त मेरा जन्म दिन है ,इसलिए आज अपनी अच्छी कहानियो में एक यहाँ प्रस्तुत कर रहा हु ,और एक अपने दुसरे ब्लॉग पर ,उम्मीद है आपको मेरी रचना पसंद आएगी |



वह एक ईश्वर का भक्त था ,किसी जीद से नास्तिक हो जाता है ,| बुरे कार्य में भी रूचि रखने लगता है ,उसे पथ भ्रष्ट होते देख ,| भगवान उसके पूर्व के कर्मो से प्रवावित आकर वर मांगने को कहते है ,नास्तिक होकर वह पहले से भी चतुर हो गया था ,| जान है तो जहान है , सबकुछ है ,सोचकर वह अमरता का वरदान मांग लेता है ,|

भगवान के जाने के बाद वह गरजता है ,| मै अमर हु -मै अमर हु , मै सर्वसक्तिमान हो गया मै अब कुछ भी कर सकता हु ,| परन्तु उसे सत्यशक्ति का बोध होता है ,| कही गलत अधर्म करुगा तो वो भगवान् फिर तो नहीं आ जायेगा ,|

उसने सभी की तरह अपने सबसे बड़े डर पर काबू पा लिया था ,|धीरे -धीरे दिन महीने साल गुजरते गए ,उसकी नजरो के सामने अपने मरते चले गए ,कभी -कभी वह चिल्ला पड़ता मै अमर हु , आंसू अब नहीं आते थे , |

धीरे -धीरे यह आदत हो गयी ,उसके अब कोई भी अपना नहीं रह गया , उसके अपनों या वंसज के संबोधन में प्यार गायब था ,|

अब उसे प्यार ,सम्मान , सभी बनावटी लगता या पुराना लगता , वही वही बाते जीवन वही वही क्रियाकलाप वही वही पतझड़ ,उसे कुछ नया नहीं मालूम पड़ता था ,| भोजन में वही तीखा वही मीठा वही खट्टा अब उसे भोजन भी अच्छा नहीं लगता था |

अपने आप को भी देखता वही एक नाक ,वही दो आँख वही सरीर अब उसे सूनापन उबन महसूस होती , रोष भी आता तो सीधे पासाड प्रतिमा के सामने समीप जाकर चिल्लाकर कहता भगवान अपना वरदान वापस ले लो ,


अब सायद वो २००० साल का होने को था ,उसके पैर अब उससे शिकायत करते रोज़ -रोज़ वही घिसटना ,उसकी त्वचा किसी खुरदरे पत्थर जैसी हो गयी थी ,|आँखे बस कटोरे में गोलिया भर थी ,उसे अब नीद भी नहीं आती थी , नीद का कोटा जो पूरा होगया था | सभी कुछ वही पुराना ,समाज उसे आदि मानव मानता और वह समाज को नहीं समाज के घर को ही आदि मानव मानता |अब उसे कुछ नया चाहिए था ,पर उसने वरदान स्वरुप अभिशाप ले लिया था ,|अब उसे भूख नहीं लगती ,प्यास भी धीरे धीरे कम हो रही थी , नाम मात्र लगती ,|

सांस क़र्ज़ हो गयी थी ,| कुछ शांति के लिए वह दुनियादारी के देव शिव के पास भी गया परन्तु नीलकंठ नहीं बन पाया ,| तब उसने अपने जीवन को ज्ञान की तरफ मोड़ दिया , ज्ञान की सीमा नहीं होती , अब उसके लिए समाज ज्ञान की दृष्टी से कीड़ा मकोड़ा जैसा था ,समाज से उसका जी भर गया था ,| और समाज उसे अपनाना नहीं चाहता था ,| समाज से अकेला वह क्या करे ,वह मानो सभी को देखता व जानता , उसके पास अब ज्ञान था ,जो समाज के कीड़े मकोडो को किसी भी हद तक नहीं समझा सकता था ,| उसे आराम चाहिए था -मृत्यु चाहिए थी ,कभी -कभी वह चिल्ला पड़ता मै अमर हु मुझे मौत चाहिए ,|परन्तु दोनों उससे रूठ गए थे ,वह आत्महत्या भी करता लेकिन दर्द होता मृत्यु नहीं होती ,अब उसकी साथी केवल दर्द थी कुछ समाज के लोग दे रहे थे कुछ वह स्वयं जिम्मेदार (हकदार )था |वह श्री कृष्ण के ज्ञान की उंगली थाम कर जो सिर्फ उसके लिया था , हिमालय की कंदरावो में चला जाता है ,| वह उसके शरिर के साथ आत्मा भी सो जाती है ,आज भी उसका शरिर इंतज़ार में है ,कब ये बर्फ पिघलेगी और वो फिर उठकर दर्द और दुनिया से रूबरू होगा | गलती से आप उसे उठा न देना ,|


वैसे इस धरती पर ८ लोगो के वेदों में सशरिर अमर होने का जिक्र है ,|



) भगवान शिव के शिष्य भगवान परशुराम इनका जिक्र चारो युगों में है ,इनका जन्म अक्षय तृतीय के मनाया जाता है , इसी दिन गंगा का पृथ्वी पर अवतरण भी हुआ था ,इसी दिन श्री गणेश जी ने महाभारत की रचना (नीव)(लिखना) आरम्भ किया था ,परशुराम के शिष्य ..अजेय गंगापुत्र भीष्म , और पांडव और कौरव के तपस्वी अजेय गुरु द्रोणाचार्य और अजेय सुर्यपुत्र कर्ण थे ,|(ये तीनो के गुरु परशुराम भगवान है )


२) भगवान वेदव्यास महाभारत, गीता .वेद ,पुराण को स्थापित करने वाले |


३) पांडव कौरव गुरु कृपाचार्य


४) गुरु द्रोण के पुत्र ,सामन्तक मणि युक्त श्री कृष्ण के शाप से दर्द से अमर अश्वस्थामा


५)रामभक्त अस्टसिद्धि और नवनिधि के दाता पवन पुत्र भगवान हनुमान जी


) सत्य के साथी विभीसन


७) भक्त प्रहलाद के वंसज पाताल के राजा बलि


८) शिवभक्त मार्कंडेय ऋषि


जाते जाते यही की हम मनुष्य भूत का रोना रोकर स्वयं को दुःख देते है ,और भविष्य का निरर्थक सोचकर दुःख का कारन बुनते है |(इसका संगीत नीचे है )


लेखक ;- विनयी .....रविकांत यादव... एम् कॉम २०१०



No comments:

Post a Comment