Tuesday, November 22, 2011

आयुर्वेद -एक जीवन स्वाद



आयुर्वेद एक विशुद्ध प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति है ,| आयुर्वेद का अर्थ है , जीवन का ज्ञान या विज्ञानं , यह चार वेदों में अथर्वेद का अंग है , इसमें अथर्वेद में चिकित्सा के साथ जादू टोना के विषय में भी ज्ञान आदि बताया गया है , इसके चिकत्सा के जनक, भगवान् धनवंतरी है ,| जो समुद्र मंथन में , विष , एरावत हाथी , लक्ष्मी , कामधेनु गाय, ५) कल्प वृक्ष ६) मदिरा ७) रम्भा ८) उच्च्स्रेवा घोडा ९) कौस्तुभ मणि १०) धनुष ११) शंख १२) चंद्रमा के बाद अंत में देव धनवंतरी हाथ में अमृत कलश लेकर उत्पन्न हुए , |

इनमे अधिकतर रत्न देव लोगो ने स्वीकार कर लिया , लक्ष्मी स्वयं विष्णु के अधीन हो गयी , दानव लोगो को इन रत्नों से कोई सरोकार नहीं था ,क्यों की इन रत्नों के साथ दायित्व और त्याग भी जुड़ा था | दानवो को केवल अमृत की लालसा थी , जिसके लिए सागर मंथन हो रहा था , जिसमे मंदराचल पर्वत मथानी और भगवान शेषनाग रस्सी बने थे , बाद में बढ़ते श्रम से मंदराचल पर्वत डूबने लगा तो ,विष्णु भगवान ने कछप अवतार से उसकी रक्षा की , |

आते है , आयुर्वेद पर जो पूर्णतः प्रकृति पहचान व प्रकृति प्रेम को दर्शाती है ,| इसमें हमारे आस -पास खान -पान मुहलगी वनस्पतिया है , जो अपना तासीर(प्रभाव ) रखती है ,तथा रोगी के वात ,पित्त , कफ, के मापन से और हमारे शरीर में पांच तत्व है ,और रोग भी इन्ही पांच तत्व से सम्बंधित होता है , ५ तत्व है , वायु , जल , पृथ्वी (शरीर) अग्नि और आकाश (मस्तिस्क सोच )


सांप की प्रकृति डसना है , तो दुर रहो और सपेरा हो तो ,पास रहो , हमारे हिन्दू धर्म में कथावो में धनवंतरी व अश्विनी बन्धु जो देवतावो के डॉक्टर है , को चिकित्सा देवता कहते है ,|

मेरे समझ में आयुर्वेद का यह भी शाब्दिक अर्थ हो सकता है , वह वेद जो आरोग्यता प्रदान करता हो , आयुर्वेद चिकित्सा की सबसे प्राचीन पद्धति है , | आयुर्वेद अब प्रकृति , दादी माँ के आँचल से निकल कर अब डाक्टरों के पर्चो पर आ गया है , | पर क्या आयुर्वेदिक दवा की सुइया है ,? शायद नहीं पर आप आयुर्वेद के मुरीद है तो शायद यह नौबत न आये ,| क्यों की रोग न पालना ही समझदारी है , | prevention is better then cure ... (एक सुरक्षा लाख नियामत )





यहाँ यह भी बताना चाहुगा कि पतंजलि और अरविन्द घोष क़ी विरासत को बाबा रामदेव ने संभाला व नवजीवन दिया ,




विदेसी उत्पाद पर उनका प्रहार अति प्रशंसनीय है , उनकी आक्रामकता ही उनकी दुश्मन है , पर उनको अभी सीखना होगा , क्यों क़ी वे केवल योगाचार्य है ,और ब्रह्मचारी भी , | लोगो का प्यार ही प्रशंसा है ,|


यहाँ बताना चाहुगा , योग प्रकृति के प्राणियों द्वारा जैसे जानवरों द्वारा विकारो को दूर करने वाली गतिविधियों से जन्मा है , और नाम भी उन्ही अनुसार रखा गया है , जैसे मत्स्य आसन , स्वान आसन , भुजंग आसन, मंडुक आसन , आदि -आदि |कौन सा आसन किस रोग में होगा यह भी ध्यान जरुरी है ,|






आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के जनक महर्सी सुस्स्रुत है , और मह्रसी चरक क़ी चरक संहिता है , |




यही आयुर्वेद च्यवन ऋषि के आँखों क़ी रोशनी व जवानी वापस ला देता है (बाद में इसी से आयुर्वेद में चय्वंप्राश आज भी आते है ), तो वही योग ,शरीर में छिपी शक्तियों को देवतावो से भी आगे ले जा सकता है , | जिसे कुण्डलिनी जागृत करना कहते है ,|


आयुर्वेद में सबसे बड़ी खासियत यह होती है , कि यह आपके प्रकृति को नहीं बदलती बल्कि स्वयं आपके प्रकृति की बन जाती है , यानी लड़ाई नहीं केवल प्यार ,|


आयुर्वेद में घर के अदरक , लहसुन, हिंग, हल्दी, अजवायन ,से लेकर बाहर का नारियल तक सामिल है , | पक्षियों के आश्रय दाता पीपल के फल में भी औषधि है , तुलसी,नीम, इमली, आवला, मिर्च,मशरूम,करेला, आम,,जामुन,देसी बबूल,गुड, चन्दन, गुलाब, हरी घास , शीतल जल, तथा ओस की बुँदे ,तक सभी में आयुर्वेद पाया जाता है,| यहाँ तक की जोख से भी आयुर्वेदिक चिकित्सा होती है , जो जमे गंदे खून को खीच लेती है,यह चिकित्सा के देव धनवंतरी के सभी हाथो में से एक हाथ में रखे दिखती है ,|

देवतावो को अर्पित वनस्पतियों में भी कुछ न कुछ है , चाहे वह धतुरा ही क्यों न हो , यहाँ मेरे पास एक सामाजिक कथा है , सेक्स के चक्कर में दो लोग ने दवा लिया एक को कोढ़ हो गया , तथा दुसरे को ज़हर बन गया , दोनों लोग ढलती उम्र 55 के थे ,|


मेरे सोच से अर्क श्रेस्ठ औषिधि होती है , शहद भी तो पेंड -पौधों के फूल से एकत्र किया जाता है , जो अपनी श्रेस्ठ्ता का दावा विश्व भर में करता है , |( आप किसी डॉक्टर के पास बहुत गंभीर हालत में ले जाय तो वो उसे तुरंत पानी की ड्रिप लगा देता है ,|ताकि जीवन की रक्षा हो )


आवश्यकता अति होगी तो अमृत अर्क भी नर्क बन जायेगा , |


अदरक ,हल्दी, लहसुन, का मेरे अनुसार प्रयोग ,एक सेव रोज खावो डॉक्टर को दुर भगावो, से बेहतर है ,इसका उदहारण घर -घर में इसका प्रयोग और यह यह सेव से महंगा भी नहीं है , |जो साबित करता है भारतीय खान-पान जलवायु अनुसार श्रेस्ठ है , |

मुख्य आयुर्वेद वनस्पतियों के पत्तो, फूल, फल, जड़,तना, में ही निहित है ,परन्तु एक रात रानी का पौधा है , जिसके पास से हटने को जी न करे , दूसरा ज्योत्रफा (रतनजोत) जो दुनिया से ही हटा देता है ,|

यहाँ मै पौधों की महिमा नहीं गा रहा हु , मै यह भी बताना चाहुगा की अफ्रीका में कुछ पौधे मासाहारी भी होते है , जो कीट पतंगों को चालबाजी से खाते है , |


खमीर खाना , पाना, -गवाना है , ये चाहत परेशानी भी है , | अतः स्वाद सीमित और नियंत्रित हो ,सांप को मारने के लिए वैसा होना या सांप चाहिए जहर -जहर को काटता है , यह क्षण भयानक होते है ,|



यूनानियो ने हमारी विरासत को संभाले हुए है , आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा को मिला कर कुछ नया प्रयोग और हासिल किया जा सकता है, |परन्तु जीवन से जीवन की चिकित्सा हितकर नहीं है , | आयुर्वेद में वनस्पतियों , प्रकृति पहचान , व दिशा निर्देश सर्वोत्तम है , | सजग जनता , सजग समाज, सजग देश यहाँ आप fantastic four की शक्तियों से भी सीख सकते है ,|




जैसे परिस्थिति अनुसार ढलना, बनना , सामंजस्य ,अग्नि उर्जा पर सामयिक नियंत्रण और प्रयोग , मन पर नियंत्रण दुर्व्यसन से दुरी , और शरिर को मजबूत रखने पर जोर , हिन्दू नीव अनुसार धर्म , अर्थ, काम, मोक्ष, है |,| और इन सबसे बड़ी बात इनको अच्छाई के प्रति प्रयोग वरना इनकी शक्तियो की कोई अहमियत नहीं |

जाते जाते एक बार हमारे आस-पास की प्रकृति ही आयुर्वेद है , चाहे वह जल हो रंग हो ,तलाब का कीचड़ हो , कीचड़ का सीप हो या सीप का मोती हो , रुद्राक्ष की माला भी हो सकती है , (जो ह्रदय सम्बन्धी रोग कम करता है, जैसे उच्च रक्तचाप आदि )एक मुखी रुद्राक्ष को सर्व श्रेस्ठ मन जाता है ,रुद्राक्ष पर खोज-प्रयोग की जा सकती है , मान्यता है , रुद्राक्ष शिव जी के आंसू से उत्पन्न एक वृक्ष का फल बीज होता है , इसके पीछे भी एक कथा है , एक बार शिव जी तपस्या कर रहे थे , उसी समय एक दैत्य ने आकर उनपर आक्रमण किया , क्रोध से उन्होंने आँखे खोली उनकी आँखों से कुछ आंसू की बुँदे गीरी , जहा जहा वह बुँदे गीरी वहा -वहा रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए , शिव जी ने क्रोध में उस दानव को तीसरी नेत्र की ज्वाला से भस्म कर दिया ,|



हवा हो या केरल का शांति आश्रम , दिमाग और शरिर के लिए शांति आश्रम की आवस्यकता हो सकती है, |

अधिकतर रोग पेट से उत्पन्न होते है ,| आज के समय को इनकी आवस्यकता के समय को पहचानना समय-समय पर पालन करना जैसे सुबह की प्राण वायु लेना , क्यों की सुबह ६ बजे तो घडी की सुईया भी उठ कर खड़ी हो जाती है , अतः ६ बजे हर हाल में बेड छोड़ दे , प्राण वायु से उम्र बढती है ,|







आयुर्वेद में मैंने अपना एक सूत्र दिया रखा है , जो सौ साल की ओर ले जाता है , जो है ....|

आहार शुद्धता (प्राथमिकता )+ स्वक्षता (चयन )- स्वाद (नियंत्रण) = स्वस्थ्य शरिर (सौ साल जीवन )


सूत्र पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है , जैसे नशा त्याग, आहार सेवन जैसे जाड़े में सर्दी में दही न खाए ,ठंडी चीजो से बच कर , संभव हो तो एक लिस्ट बनाये की कब उठना है , कब सोना है, कब खाना है ,कब पीना है , कब किस दिन क्या आहार बनेगा , आदि -आदि ,| बुढ़ापे में जाड़े में गर्म दूध में चुटकी भर हल्दी ले ,|

इसके पालन से सौ साल उम्र जिया जा सकता है , जिसका आयुर्वेद में जिक्र है , की मनुष्य की वास्तविक उम्र सौ साल होती है , इससे पहले की मृत्यु आहार -विहार ,रहन-सहन, खान-पान आदि की त्रुटियों से होती है , |

योग करो , कर्म करो , पसीना निकालो , प्रकृति चयन प्रथम हो , व आधुनिक भोजन कम हो , आप सौ साल जिन्दा रहेगे ,और इसके पालन से आपका बच्चा भी पढने में तेज़ होगा , खुश रहे खुश रहने से उम्र (ज़िन्दगी)बढती है ,और रोग घटते है , | अंत में यही की स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह रहेगे तो पछताएगे अतः दर्द झेलने से अच्छा है सजग रहे ,अतः स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहे , जिससे तन और मन दोनों स्वस्थ्य और सर्वोत्तम होगे , | मै यहाँ सौ साल के जीवन की गारंटी नहीं ले सकता क्यों की वो आप पर और आपके जीवन स्तर पर निर्भर करता है ,|


जाते -जाते .......सर्वे भवन्तु सुखिन : सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चित् दुखभाग भवेत् .....||


यदि आप आयुर्वेद के डॉक्टर खोज रहे है , तो b .h .u . के अजय पाण्डेय(काय चिकित्सा ) , आदि अन्य को दिखा सकते है , |


जाते -जाते यही की चिकित्सक कभी पैसे के लिए कार्य न करे , पैसे को ईमान न बनाये , | आशा और ज़िन्दगी दोनों एक दुसरे के पूरक है ,|also click on;-http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A7%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%B8

लेखक ;- आप के स्वास्थ्य के लिए ......रविकान्त यादव

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Saturday, October 29, 2011

वास्तु ज्ञान

देवो के विकार से एक भीमकाय दानव उत्पन्न हुआ , उसने पुरे देव लोक में हंगामा , तबाही उत्पन्न करने लगा , इससे परेशान सभी देवता उसे देवलोक से निकाल कर , सभी देवतावों ने उसे धरती पर फेक दिया ,और कहा जावो धरती पर तुम्हारा मान होगा और पूजा भी , जिस -जिस अंग को पकड़ कर देवतावों ने उसे फेंका उस पर उनके अधिकार माने गए है , |


जब वह उत्पाती दानव धरती पर गिरा तो उसके औंधे मुह गिरने की स्थिति अनुसार वास्तु शास्त्र के नियम बनाये गए जैसे आपके भूमि पर ईशान कोण (कोना) २) आग्नेय कोण ३)नैऋत्य कोण ४) और वायब्य कोण होते है |


हिंदु धर्म में मान्यता है ,कि धरती पर मकान आदि बनवाते समय इनका पालन करना चाहिए जिससे घर में सुख ,शांति, सम्ब्रिधि , निरोगता , बनी रहे , |


वास्तु शास्त्र में दिशावो का ही सारा खेल है , तिजोरी किस दिशा में खुले ,स्नान घर किस दिशा में हो , आदि -आदि ईशान कोण सबसे पवित्र होता है , यह जमीन पर उत्तर -पूर्व कि तरफ का कोना होता है , यह पवित्रता , सफाई और स्वक्षता का प्रतिनिधित्व करता है ,|


आग्नेय कोण यह पूर्व-दक्षिण का कोना है ,यह जैसा की नाम से ही प्रकट है , उर्जा , उत्साह और ताकत का प्रतिनिधित्व करता है , ठीक जैसा दाहिना हाथ ,...


नैऋत्य कोण , यह दक्षिण - पक्षिम कोना है , यह नीत दिनचर्या का प्रतिनिधित्व करता है , |


वायब्य कोण यह पक्षिम-उत्तर का कोना है , यह वायु का स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करता है ,| इन्ही उपरोक्त चार दिशावो व कोण के अनुसार सारे रहन -सहन की व्यवस्था की जाती है , आप इसे विज्ञानं से जोड़कर भी देख सकते है , जैसे north pole -south pole आदि, चित्र बहुत कुछ स्पस्ट करता है , देखे ........


ईशान कोण पूजा के लिए होता है , यहाँ मंदिर बनाते है ,तथा इसे सबसे नीचे सभी ज़मीन की तुलना में हल्का ढलान रखते है ,|यहाँ पूजा के पेंड भी लगा सकते है , जल स्थान बना सकते है , |


२)आग्नेय कोण यहाँ आप रसोई घर या बिजली तार supply आदि उपकरण रख सकते है ,|


३) नैरित्य कोण इसे दिनचर्या अनुसार प्रयोग का ध्यान रखा जाता है , इसे सबसे ऊँचा बनाया जाता है , यह आप मान सकते है , यह वास्तु दानव की कमर है ,(कमर के नीचे का भाग )


४) वायाब्य कोण चूँकि यह स्वतंत्रता का परिचायक है इसलिए इसे हवादार जगह दिया जाता है , ताकि की हवा आ -जा सके घर में हवा का अहसास मिलता रहे ,


वास्तु में रंगों का भी विशेष स्थान है , तथा अलग -अलग अन्य वस्तुए भी है , जैसे ॐ , स्वस्तिक , कलश , नारियल, मूर्ति, अच्छे चित्र, तथा कारणों का वास्तु अनुसार हल भी होता है , मै यहाँ काफी कुछ बता चूका हु , फिर भी यदि चाहे तो वास्तुशास्त्री से मिल सकते है , या अच्छे लेखक की किताब ले सकते है , या नेट पर विस्तृत खोज सकते है , बिना तोड़ -फोड़ भी हल होते है , मेरे दिए दोनों पते पर बिंदास क्लीक करे;-1)http://ranchiexpress.com/82237.php

2)http://www.patrika.com/article.aspx?id=9342

चीन में यही कला फेंग सुई कहलाती है ,|

लेखक;- वास्तुशास्त्री ......रविकांत यादव

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Friday, October 21, 2011

रत्न, रहस्य और राहत




रत्नो को एक तरह से पत्थर ही माना गया है ,पर ये दुर्लभ पत्थर बहुत कीमती होते है ,| हमारे ब्रह्मांड मे अनेक ग्रह है (मुख्यतः नौ ) , और हम धरती पर रहते है ,और उनसे प्रभावित भी होते है ,| परंतु इन ग्रहो का इस धरती पर प्रतिनिधित्व ये रत्न ही करते है , जैसे जिस ग्रह का रत्न होगा उसकी मान्य रखेगा , जैसे यदि हम अपने बच्चे को प्यार करते है ,| ठीक उसी प्रकार ये ग्रह भी अपने रत्नो से प्यार करते है ,और धारक व्यक्ति को राहत प्रदान करते है ,|

एक तरह से रत्न का दूसरा रूप इलाज़ भी है ,इसलिए सोच समझ कर व्यक्ति को अपने लिए रत्न धारण करना चाहिए , माने आपको सर्दी है , और आप किसी और रोग की दवा खाये तो सर्दी तो नहीं जाएगी बल्कि आप और बीमार ही जाएगे ठीक इसी प्रकार रत्नो का अपना प्रभाव होता है ,रत्नो की मात्रा धारक के लिए निर्धारित होती है , आठ रत्ती से कम न हो और अलग अलग मात्रा भी आप धारण कर सकते है , सलाह ले , |रत्न जैसे मोती ये चंद्रमा का असर कारक प्रभाव उत्पन्न करता है , शीतलता , शांति प्रदान करता है ,माणिक ये सूर्य का प्रभावी माना गया है , ऊर्जा प्रदान करेगा , |

ठीक इसी प्रकार सभी रत्न है , 1) हीरा 2) मोती 3) माणिक 4) मूंगा ) 5) पन्ना 6) पुखराज 7) नीलम 8) गोमेद 9) लहसुनिया


आदि रत्न है |


इन्हे आप लाकेट या अंगूठी मे पहन (धारण ) कर सकते है , | ये रत्न जो अपने ग्रह की किरणों को सोखते है ,और फिर शरीर मे पहुचाते है | और ये अपना कार्य करते है , इसलिए ये शरीर से टच करे , ध्यान रहे आजकल वास्तविक रत्न कम ही मिलते है ,| नकली की भरमार है , जिन्हे पहचानना अत्यंत मुश्किल होता है , | एक बार मैंने पढ़ा था , कि एक राजा थे , उन्होने कई रत्न धारण किए थे , उनके मौत से कुछ दिन पहले उनके सारे रत्न काले पड गए थे ,|


विस्तृत जानकारी हेतु बिंदास यहा नीचे क्लिक करे , और विषय वार सारी जानकारी हेतु दिये पते के लिंक के फोटो पर या (heading) भी क्लिक करे;- http://hindi.webdunia.com/religion/astrology/ratna/

लेखक ;-गौर से ...आपका रविकान्त यादव

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Tuesday, October 11, 2011

रंग


एक गाँव था ,सारंगपुर वहा सभी अधिकतर गोरे थे ,| केवल कुछ गिने लोग ही काले थे ,| गोरे लोग उनकी हंसी उड़ाते ,उपहास करते ,हेय की दृष्टि से देखते अपने को ऊँचा समझते , | गोरे व्यक्ति सम्मानित थे ,वो धनी लोगो का गाँव था ,| एक रात खुनी डकैतों ने उस गाँव पर धावा बोला , सभी यहाँ वहा ,जहा बनता पड़ा छीप गये, वो लूट पाट मचाने के बाद कत्ल कर देते थे, अगली सुबह जिन्दा बचने वालो में अधिकतर काले व्यक्ति ही थे ,| क्यों की उनकी साथी वो काली रात थी ,जिसको उनके काले शरीर ने ओढ़ रखा था ,|










इसलिए हमें ईश्वर को दोष नहीं देना चाहिए , ईश्वर ने जो हमें दिया ,सही ही दिया ,क्यों की हमारा वर्तमान ,भूत से प्रभावित होता है |और भविष्य वर्तमान से बनता है ,| अतः ईश्वर ही सर्वशक्तिमान न्याय कर्ता है ,|

लेखक ;- साथी ....रविकांत यादव ...also click ;-http://justiceleague-justice.blogspot.com/

Wednesday, September 28, 2011

वनदेवी का शाप

एक सम्ब्रिध जंगल चारो तरफ हरयाली ,फल फूल रंग बिरंगे पौधे ,चहकते पक्षी ,अनेक उछलते कूदते जानवर एक बार वहा एक मनुष्यों का दल शिकार करने गया ,उन निर्मम शिकारियों ने एक दूध पिलाते हिरणी को मार गिराया ,अनाथ शावक तड़प कर छटपटा कर इधर उधर भटकने लगा ,|


रोने चिल्लाने की करुण क्रंदन से वन देवी को आने पर विवश होना पड़ा ,वन देवी आती है तो वहा का नज़ारा देख स्थिति समझने में देर नहीं करती ,|

वनदेवी पुरे क्रोध में शाप देती है ,कि अब जो भी मनुष्य इस सुन्दर वन में कदम रखेगा , मांस भक्षण करेगा ,शिकार करेगा मन और आचरण से जानवर (पशु )बन जायेगा ,उनके इस शाप को अनाथ हिरण के शावक ने बढाया और वह मानव शरिर रहते हुए भी बुद्धि ,ज्ञान कर्म से जानवर कि तरह व्यवहार करेगा ,|

वन देवी के इस शाप का असर बढ़ते समय के साथ असर दिखाया और आज जो भी हिंसक व्यवहार या हिंसा करता है , मांस भक्षण करता है ,| उसकी बुद्धि क्षीण हो जाती है ,मत मारी जाती है ,|और वह क्रोध के अधीन अपने कर्म से अपना ही नाश कर लेता है , या अपनी जिंदगी नर्क बना कर मारा जाता है ,||

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लेखक;- शाकाहारी .....रविकान्त यादव


Sunday, September 4, 2011

गुरु कृपा


महाभारत युद्ध समाप्त चुके थे ,दुर्योधन भीम की गदा से घायल मरणासन्न अपना आखिरी समय गुजार रहा था , द्रोणाचार्य पुत्र अस्वस्थामा दुर्योधन से मिलता है ,दुर्योधन अपना आखिरी इच्छा में उससे पांडवो का सर मांगता है ,रात में अश्वस्थामा पांडव शिविर में धोखे से जाकर पांडवो के भ्रम में उनके पांचो पुत्रो को मार कर दुर्योधन को देता है ,जब दुर्योधन देखता है ,ये तो बच्चो का सिर है ,वह और तड़प उठता है ,की इन्होने मेरा क्या बिगाड़ा था ,तथा वही तड़प कर मृत्यु को प्राप्त होता है ,|

इधर द्रौपदी हाहाकार कर विलाप करने लगती है , अर्जुन अस्वस्थामा को पकड़ कर लाने की प्रतिज्ञा करते है| ,खोजने पर अश्वस्थामा जान पर बनी देख विष्णु का सर्वोच्च अस्त्र नारायण अस्त्र चलाता है , उसके जबाब में अर्जुन तुरंत शिव का सबसे सर्वोच्च अस्त्र पशुपति अस्त्र चलाते है ,सफलता की चाह में अस्वस्थामा तुरंत मंत्र पढ़ ब्रह्मास्त्र उत्पन्न कर पांडव और कृष्ण का नास हो कह चला देता है |,कृष्ण अर्जुन से तुरंत दूसरा ब्रह्मास्त्र चलाने को कहते है, दो ब्रह्मास्त्रो और महाशाक्तिवो के टकराहट से भरे दिन में ही अँधेरा छा जाता है ,तड -तडआहट के साथ बिजलिया चमकने लगती है ,हवा ,पानी ,धीरे धीरे उस्ण-से उस्ण होने लगते है ,जीव जंतु छटपटाने लगते है , सांस लेने में तकलीफ होने लगती है ,पृथ्वी कम्पायमान होने लगती है ,|




सृष्टी का विनाश देख भगवान् वेद व्यास और अन्य देवता आ कर दोनों से अपना -अपना शक्ति वापस लेने का आग्रह करते है ,अर्जुन अपने ब्रह्मास्त्र को वापस ले लेते है ,परन्तु अश्वस्थामा अपने ब्रह्मास्त्र को वापस लेने की विद्या नहीं जनता था , तो देवो ने कहा किसी एक लक्ष्य को बोल अपने शक्ति को आदेश दो ,तो उसने कहा पांडव के आखिरी वंश (अभिमन्यु पत्नी उत्तरा गर्भ ) का नाश हो ,अर्जुन अस्वस्थामा को पकड़ कर द्रौपदी के पास ले जाते है , गुरु पुत्र होने से उसे प्रताड़ित कर छोड़ दिया जाता है , पर कृष्ण उसकी कौस्तुभ मणि उतरवा कर अमर दर्द का शाप देते है |,बाद में श्री कृष्ण पांडव वंश के आखिरी चिराग को अपनी परीक्षा से नया जीवन देते है ,और उसका नाम परीक्षित रखा जाता है ,तब श्री कृष्ण कहते है ,पार्थ सोचो उस गुरु की महिमा जिसने अपने पुत्र को ब्रह्मास्त्र वापस लेने की विद्या नहीं सिखाई परन्तु तुम्हे इस विद्या में निपुण किया ,और अपने बेटे से भी बड़ी शिक्षा देकर तुम्हे उससे भी बड़ा विश्व का सर्व श्रेस्ठ धनुर्धर बना दिया ,||

लेखक ;-प्रस्तुति .....रविकांत यादव