Wednesday, September 22, 2010

भगवान श्री गणेश




आज भगवान श्री गणेश का मुंबई में सबसे बड़ा पर्व १० दिनों के पश्चात समाप्त हो रहा है ,
श्री गणेश अपने माता -पिता के सबसे अनोखे पुत्र है , माता की आज्ञा पालन हो ,या पिता के आदेश पर मह्रसी वेद व्यास के रामायण का लेखांकन हो , ये श्री गणेश ही हो सकते है ,जो मह्रसी के श्लोको को उनसे भी कही अच्छी तरह परिभाषित किया ...और परिणाम में देव प्रथम पूज्य ,मोदक और जामुन को ग्रहण करने वाले , विघ्न विनासक श्री गणेश ने ..महाभारत और गीता ज्ञान को संसार को अवगत कराया .....
ॐ गन गणपतये सिद्ध विनायक नमो : नमः
लेखक ;- एम् कॉम २०१० प्रार्थी

Tuesday, September 21, 2010

आज के रावण




















त्रेता युग में राम थे ,रावण था , और आज कलियुग में भी रावण है ,और राम भी शायद कही होगे ही ,परन्तु समस्या यह है ,की राम वही के वही है , क्यों की उनकी जरुरत थी और है ,परन्तु रावण जहा था ,वहा से अपने आप को काफी विकसित कर चूका है ,क्यों की उसकी जरुरत नहीं है ,और जाहिर है ,कलियुग में उसका विकाश अच्छाई के प्रति कही नहीं है ,उसके आस पास भी नहीं है ,पहले रावण तपस्या करते समय अपना सर उड़ा कर ब्रम्हा को अर्पित कर ता था ,पर आज का रावण अपना नहीं समाज से अच्छाई का ही सर उडाना चाहता है ,अपने साथ ले कर मरता है , अपने स्वार्थ के लिए .............

पहले का रावण नाग वंशी था ,पर आज का रावण इच्छाधारी है ,बच्चो तक को रूप बदल कर भयंकर विष दे देता है ,.....

पहले का रावण शिव को अपने यहाँ स्थापित करने में असफल रहा ,पर आज का रावण स्वयं शिव बनना चाहता है .........

रावण विद्वान था ,लोग कहते है ,पर रावण के पैर में भी विष और साप ही मिलता है ,......वो भी पुराने रावण से कही बढ़कर ....आज का रावण कुचक्र रचता है ,एक्सिडेंट करवाता है ,,,,

पहले का रावण उड़ने वाला विमान पुष्पक चलता था ,पर आज का रावण बुरे आदमियों को चलता है ....अपने राक्षाशी दल को तुरंत पहचान जाता है ....

पहले का रावण अपने दस सर रखता और अपने ऊपर विस्वास करता ,पर आज का रावण अपने दस लोगो को दस सर देकर विश्वास रखता ... करता है .....और एक साथ दस जगह होता है ...

पहले का रावण ताड़का, सुरसा ,त्रिजटा ,डंकिनी , ,आदि राक्सनियो पर कुछ ज्यादा ही भरोसा करता और उन्हें नचाता रहता था ,पर आज का रावण पर इस्त्रियो को भी नहीं छोड़ता विस्वास वही पुराना है ........

पहले का रावण तो माता सीता का अपहरण किया था पर आज का रावण छोटी बच्चियों तक को नहीं छोड़ता उनका दुष्कर्म ...बलात्कार कर देता है ,...गन्दी नजर रखता है ,उनकी फिल्म बना लेता है ...ब्लैक मेल करता है ,....और भारी भी कर देता है ...गन्दगी में अत्याचारियों को भी सरम आ जाये .....जानवरों तक को तडपा कर मारता है ...

पहले का रावण अपने भाई कुबेर का लंका हड़पता है ,पर आज का रावण पुरे समाज देश को ही हड़पने को तत्पर rहै .....पहले का रावण मारीच ,कुम्भकरण ,अहिरावन ,कालनेमि को नचाता था ....पर आज का अन्य , , तमाम लोग को नचाता है .......

पहले का रावण हनुमान जी की पूंछ में आग लगाता था ,पर आज का रावण एड्स का इंजेक्सन लगाता है ......कारन वही दरंदिगी वही ....जलील करना

पहले का रावण कम दिखता था ,पर आज का रावण दिखता ही नहीं है .....

आज के रावण का मानना है ,की दुनिया में सेक्स से अच्छा कुछ नहीं .....इस पर पोल हो तो सही रिजल्ट आये ....

आज के रावण से गिरगिट भी सरमा जाता है ...वह भी उसके जितना रंग नहीं बदल सकता ...

पहले का रावण सनी देव को उल्टा लटका कर रखता था पर आज का रावण सीधे आँख फोड़ने को कहता है ....

भारत में कही रावण की पूजा भी होती है ,मै जानना चाहता हु क्यों ?? आप भी जावो और जानो.....

हमें आज के रावण की कत्तई जरुरत नहीं है , क्यों की श्री राम वही के वही त्रेता युग वाले है ,वो भी बिना अपने बानरी सेना के और रावण अपनी सेना को और बड़ा बना कर रक्त बीज की तरह हर जगह है ,और श्री राम से बहुत बहुत आगे आ चुका है ,...आज श्री राम भी इशे नहीं मार सकते क्यों की पहले वह श्री राम से उम्र में बड़ा था , पर आज कही मेघनाथ के दंभ पर चरम पर है ,,......राम की जरुरत थी इसलिए वे वही के वही है ....पर रावण उपेक्षित था , इसलिए ये बहुत बहुत विकाश कर चुका है .....

और पाप की चरमता को पार कर रहा है ......


रावण के लिए ....

चलता समय बढ़ता पाप ....

जिंदगी बन गयी एक अभिशाप ...

किस्मत पर भरोसा नहीं अपने आप ....

खुद पर बस नहीं चला तो गाया प्रभु का जाप .....


लेखक ;- राम की खोज में .....












हम हमारा दिल और न्याय





















दोस्तों मंदिर मस्जिद पर बहुत गन्दगी और राजनीति हो रही है ,इसलिए आज फिर इंडियन आप के साथ है ,चूँकि हमारा देश ,सभी धर्मो वाला देश है ,५ प्रमुख धर्म ,

हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,इसाई ,बौद्ध,और जैन ,

जानते है मेरा नजरिया क्या है ,

इस्लाम ; - नियमो पर रहकर ही साफ़ पाक अल्लाह का प्यार पाया जा सकता है ,यही एक राह अल्लाह के पास ले जाएगी ,....


सिख ;- अपनी जड़ो को न त्यागो ,वृक्ष की तरह महान बनो ,वृक्ष बनो ....


बौद्ध ;- अपना दीपक स्वयं बनो ,कोई भी सदा साथ नहीं होता , ईश्वर भी ...


जैन ;- सभी जीव जंतु समान है , सभी जीव जंतु समान है , सभी में एक ही प्राण उर्जा होती है , अन्यथा किसी की कोई अहमियत नहीं ......


हिन्दू ;-हिन्दू धर्म में सबसे ज्यादा धार्मिक, वेद, पुराण, है ,इसलिए ये थोड़ी लम्बी है , ;- हिन्दू के आखिरी देवता श्री कृष्ण कहते है ,सभी राहो की एक मंजिल है ,प्रेम ,सभी नदिया सागर में ही मिल जाती है ,प्रेम का पलड़ा हमेसा भारी होना चाहिए ,जहा प्रेम नहीं वहा कुछ नहीं कुछ नहीं , राजा शिवी बनो आँखों पर पट्टी हो ,दिल पर हाथ हो ,


चाहे इन्द्र कबूतर हो या अग्नि बाज़ ,और एक महर्षी दधिची भी थे ॥

दिल की पवित्रता पहली और आखिरी दरवाजा है ,...भला काला दिल कौन चाहेगा ,


हिन्दू धर्म में मंत्रो ,यज्ञ का आज के विज्ञानं युग में यही अवधारना है की सरीर और वातावरण को वैज्ञानिक लाभ मिलता है , यज्ञ सामग्री ,अग्नि से वायु से शरीर ग्रहण कर स्वस्थ्य रहता है ,

अग्नि ,हवा ,और मंत्रो के उच्चारण से सरीर पर प्रभाव पड़ता है ,

एक हिन्दू वर्ष में २५० व्रत पर्व है ,यदि आप आत्म ज्ञान और तप करना चाहते है ,तो इसे सभी को धारण कर सकते है , परन्तु आप अन्दर स्वक्ष और पवित्र है , तो वही पूर्ण है ,

क्यों की आप एक जल से भरे या खाली घट को और खाली या भर नहीं सकते ....इसा ई धर्म में शाम को एक मोमबत्ती जला कर प्रभु यशु से माफ़ी और प्रार्थना माँगना ही काफी है ,

परन्तु दिल दिमाग एक पवित्र होना चाहिए ,

श्री कृष्ण कहते है ,सभी तीर्थ व्यर्थ है , जब तक आप दिल ,दिमाग से पवित्र न हो , एक संत रविदास जी ने भी कहा है ;-मन चंगा तो कठौती में गंगा

एक कमल पुष्प का जन्म कीचड़ में होता है ,पर पुष्प देव स्थानों पर प्रिय होता है ,

हल्की हवा के झोंके से भी लाख कोसिस बाद भी आँख में धुल तो पड़ ही जाती है ,किसी का जीवन पूर्णतः सुद्ध नहीं होता ,भगवान का भी , अतः छोटी मोटी गलतिया फिर न हो और ईश्वर से अज्ञानता के लिए माफ़ी से ही सज्ज़न पुरुषो को क्षमा दान मिल जाता है ,



न मंदिर बनावो न मस्जिद बनावो एक देश जो मंदिर -मस्जिद जैसा हो

अतः सभी धर्मो का रस -सार -तत्वा एक ही है ,प्रेम ,प्रेम से याद आया एक कवी सायद कबीर जी ने कहा है ...पोथी पढ़ पढ़ जग मुवा पंडित भया न कोए .ढाई अक्षर प्रेम के पढ़े सो पंडित होए ...

अच्छे प्रेणना ,पुण्य ,प्राण , की रक्षा धर्म है ...इनके दुश्मनो का नहीं ...


भूख -प्यास -दुःख -दर्द - संसार का नियम है ,

सभी को एक दिल ,दो आँख ,कान ,नाक ,हाथ , पैर है ,और सभी को मरना भी है ,

मकान आधार -नीव पर निर्भर करता है ,अगला जन्म इशी जन्म पर निर्भर करता है ,कुछ लोग गिरते चले जाते है ,और कुछ चमकते ,

क्रोध-इर्ष्या शैतान का वह दूत होता है ,जो स्वार्थ सिद्ध कर गर्व से चला जाता है ,और पीछे अपना सुराग तक नहीं छोड़ता

५ प्रमुख धर्म है ,तो ६ विकार maane जाते है ,

शैतान को रोकने के लिए अभी अनेक धर्म बनेगे जो इन्ही धर्म के बीच रहता है ,....... और रहेगा ॥


जाते जाते दोस्तों हमारे देश को एषा बना दो की ५-६ धर्म ही नहीं दुनिया का हर धर्म का नागरिक यहाँ भारत में आये बिना अधुरा समझे ,और हिनुस्तानी बनने आये क्या आप उशे भारतीय बनायेगे ??

क़द्र अच्छे इंसानों की हो ,धर्म की नहीं ........प्रथम प्राथमिकता सदा पैसा नहीं प्यार होना चाहिए ,क्योकि इंसान से ही पैसा है .पैसे से इंसान नहीं है ,सत्य ,धर्म ,ईमान , से बड़ा पैसा नहीं है ,

प्रसंशा भूख ,अहंकार , पतन के रास्ते है ...जब भी हमारा अहम् हम पर भारी होने लगे सोचो हम एक जन्म लेने वाले छोटे अबोध बालक है ,


मनुष्य स्वभाव व आत्म बोध के लिए ;-

विधाता ने बनाया एक खिलौना ऐसा जिसने अलग अलग धर्म दिया ,

जलता रहा वह अलग अलग आग से इसलिए अलग अलग कर्म दिया ,

पर वह कर गया एषा की खुद खुदा को भी शर्म दिया ,

सब कुछ ख़त्म हुआ ,बहुत देर हुई तो kahi जाकर सज़ा के लिए ईश्वर ने थोडा सा मर्म दिया ,,,,,,,,


एक बार फिर जानते है ,सभी 6 धर्मो के ज्ञान ,पवित्र पुस्तकों को ,


हिन्दू ;- धर्म में चार वेद , ऋग्वेद ,सामवेद ,यजुर्वेद ,और अथर्वेद है ,तीन पुराण है , ब्रह्मा पुराण , विष्णुपुराण ,और शिवपुराण , इनके अंतर्गत २० पुराण है ,

और भगवान श्री कृष्ण द्वारा ज्ञान भागवत गीता है ,


मुस्लिम ;-इस धर्म की पवित्र ज्ञान पुस्तक है ,कुरान ,हदीस जो मोहम्मद जी रहीम जी ने दिया है ,


सिख ;-इनकी पवित्र पुस्तक गुरु जी द्वारा गुरुग्रंथ साहिब है , बाबा गुरु नानक जी पूजनीय है ,


इसाई ;- इनकी पवित्र पुस्तक बाइबिल है , प्रभु यसु पूजनीय है ,


बौद्ध ;- इनकी पवित्र ज्ञान पुस्तक धम्म ज्ञान के अधीन त्रिप्तिका (तिपितिका ) है , इनके दाता पूजनीय भगवान गौतम बुद्ध है ,


जैन:- इनकी पवित्र पुस्तक कल्पसूत्र ज्ञान कहलाता है , इनके भगवान महावीर है ,


इन किताबो की पहले भी आवासयक्ता थी और आज भी ज़रूरत है ,क्यों की इनके योग्य ब्यक्ति आज भी कम है , ज़रुरत से मतलब इनके ज्ञान को आचरण में लाने से है ,और कम होते जा रहे है ,.................................

इन पवित्र किताबो में केवल ज्ञान योग्य अच्छी बाते है , बुरे कार्य न करो ,,,,

किन्तु किसी में सज़ा नहीं है ,कि ये सजा दो वो सजा दो ,.........क्यों , क्यों कि इनका मकसद है , हमें राह दिखाना एक अच्छा समाज बनाना , इसलिए न गलत करो न होने दो ,

मेरा एक धर्म है ,मानवता और एक जाति है ,अहसास ,


एक बार फिर न मस्जिद बनावो न मंदिर बनावो एक देश बनावो वो मंदिर मस्जिद जैसा हो ........


लेखक ;- जान लड़ा कर .......मिलते रहेगे यदि सब अच्छा हो ......एम् .कॉम। २०१०























Thursday, September 2, 2010

अब तो जागो



























































दोस्तों इस लेख को मैंने पहले लिख दिया था ,पर अब उचित समय आ गया है ,पृथ्वी को ब्रह्माण्ड में हवावो का ग्रह माना गया है ,जो नीला दीखता है ,कितना खूबसूरत है हमारा ग्रह , नारंगी जैसा यही कहते है ,न वैज्ञानिक ....इस नारंगी को सडा कर पिलपिला न करो .......५ जून को ham paryawaran diwas ke roop में bhi
manate है ,
पर्यावरण परि+आवरण से मिल कर बना है ,मतलब हमारे आस पास का मिलना या वातावरण ही पर्यावरण है ,
यदि इसे हम साफ़ सुथरा रखेगे तो ,निरोगी ,व स्वस्थ्य ,सुलभ जीवन जी सकेगे ,
क्यों की एक पिन किल की नोक भरी भरकम वाहन को पंचर कर देती है ,
आज हमारी मनमानी से हमारी ओजोन परत सुरक्षा छतरी भी हमारा साथ छोड़ रही है ,परिणाम सभी जानते है ,
भू जल जो अमृत है ,गिरते स्तर के साथ ये सहरो में दुर्लभ हो जायेगा ,
नदियों में लग रहा है ,मूल जल से ज्यादा गंगा में २६ सहरो के नाले २५० प्रत्यक्ष ,अप्रत्यक्ष ,रूप से गिरते है ,
वाराणसी मोक्ष नगरी में एक पेपर समाचार पत्र के अनुसार ३०० टन राख और २०० टन अधजले शव वर्ष में पानी में गिर कर उन्हें और भी प्रदुसित कर रहे है ,
औसत में सुद्ध पानी ३० % और असुध पानी ७० प्रतिसत हो गया है ,यानि परीक्षा में फेल ,
कहते है गंगा पाप हरती है ,यदि आप एक गिलास के पानी में नमक या चीनी झोलते जाये तो एक समय में वह भी नहीं घुलता ,ठीक इशी प्रकार गंगा जी अब हमारे पाप नहीं हरती ,जब तक जल पीने योग्य न हो ,
हमारे फैलाये ,कूड़े करकट प्लास्टिक बरसात में नदियों में मिल जाते है ,आने वाले समय में नदी नदी न होकर नाले भर रह जायेगे ऐसा अभी से लगने लगा है ,कई नदिया इस श्रेणी में आ भी चुकी है ,
जमाना कहा से कहा गया पर हम हरिश्चंद्र के ज़माने पर ही विश्वास रखते है ,
इसी तरह प्रदुषण और वृक्ष का अन्धादुन्ध कटाई जारीरही तो आसमान से आग बरसेगी और ज़मीन से रोग निकलेगे , चापाकल और कुवो से आर्सेनिक निकलेगा ,मनुस्वो के लिए मलेरिया ,पीलिया ,का बाप बहेलिया आएगा जो प्राण पखेरू ही पकड़ ले जायेगा , प्लास्टिक की थैलिया भले ही मनोवैज्ञानिक खुसी देती है ,पर ये मरते मरते भी मारती है ,हर वर्ष वर्षा के साथ कितनो टनों कचरे जो हम फैलाते है ,नदियों ,तालाबो ,जल में ,खेत में पशु से होकर पुनः हमें मिलता है ,जो आयुर्वेद के १०० साल के स्वस्थ्य जीवन को ग्रहण लगा देता है ,
इसका उदहारण मरते चिल ,गिद्ध ,गौरया ,मोर ,आदि है ,यही हाल रहा तो आगे इनके जीवाश्म ही सेष रह जायेगे ,
प्लास्टिक सस्ता तो है ,पर पर्यावरण को बहुत महंगा साबित हो रहा है ,और ये प्लास्टिक केवल ब्याक्तिगत ही सस्ता है ,यहाँ सभी लोग स्वार्थी जो है ,
यदि हम पर्यावरण की रक्षा नहीं कर सकते तो ,हम तो मज़े से जी लेगे पर हमारे बच्चो के बच्चो पर जो गुजरेगी वो नरक से कम नहीं होगी ,भविष्य में और भी समस्याए आयेगी और नए नए रोग भी आयेगे , .....
समझदारी यही है ,की परिणाम को हल न करो ,समस्या ही न पैदा होने दो ....
एक कहावत भी है ,एक सुरक्षा लाख नियामत ....इलाज से अच्छा बचाव है ........
आज १६ सेप्टेम्बर है , विश्व ओजोन सुरक्षा दिवस है , अतः ग्रीन gaiso का उत्सर्जन कम हो ,इन्हें रोको ....
अग्नि ,हवा ,जल ,पृथ्वी ,आकाश ,को यदि हम सुरक्षित नहीं रखेगे तो ये हमारे अन्दर भी है ,तुम्हारा विनाश हो जायेगा ,
जब आकाश से आग बरसेगी तो ये वृक्ष ही हमें बचाए गे ,वृक्ष लगभग सभी धर्मो में पूजनीय है ,हिन्दू इसे पंचवटी ,यानि पांच वृक्ष एक साथ होते है .कहते है ,ये भी मोक्ष के रास्ते है ,वृक्षो में वट वृक्ष सर्वोपरी है ,या श्रेस्ठ है ,मान्यता है ,ये समाधिस्त ऋषि है ,इनको काटना पाप है ,वेदों के अंग आयुर्वेद में यही वनस्पति और प्रकिती चिकित्सा है ,ये वृक्ष ही हमें रात को भी प्राणवायु देते है ,...................
सभी शहरों के नालो को सोधित किया जाये ,यन्त्र लगाये जाये ,
प्लास्टिक की जगह कागज़ के थैले प्रयोग हो ,जूट ..पटसन ...नारियल की रस्सी या उपयोग हो
रसायन की जगह जैविक खाद प्रयोग हो ..नीम आदि
वर्षा जल से ही भू जल संरक्षित किया जा सकता है .....अतः अपने तालाब कुण्ड को साफ़ और बचा कर रखो इनका महत्वा ही इन्हें पूजनीय बनता है , हिन्दू धर्म और सिख धर्म गवाह है ,
अपने प्राचीन तालाब ,को पाटने से रोको तभी भू जल को सुरक्षित किया जा सकता है ,
परन्तु यहाँ उल्टा हो रहा है ,
अभी हाल ही में चित्रा जहाज मुंबई में न बचा सके ,और न उस पर ka धन और न पर्यावरण तीनो ही नहीं बचे ,
कम्पनी पर जुरमाना लगा दो ,
प्लास्टिक ,बजबजाते नाले ,कूड़े -करकट ,इनसे चाहे बिज़ली बनावो ,सड़क बनावो ,या खाद बनावो ,पर इनसे मुक्ति दो या विकल्प तलासो ,अंत में यही की ,खतरनाक रसायन ,गैसों , कित नासक , अपने देश में न लावो ,भोपाल गैस कांड से सिख लो ,, भूमि ,जल .वायु ,पृथ्वी ,आकाश ,जिससे हमारा औचित्य है ,इन्हें प्रदुसित न करो ....रसायन ,विकिरण ,गन्दगी ,मानव स्वार्थ से इन्हें बचा कर रखो ,इनकी सुरक्षा में लापरवाही न करो , जानकारी होना आवश्यक है , विकल्प होना धुन्धना ज़रूरी है ,
सारे उद्योग ,कंपनी ,कारखाने ,का एक ही लक्ष्य है ,अधिक से अधिक धन कमाना ,चाहे किसी कीमत पर ,चाहे पर्यावरण तहस नहस ही हो जाये ......तुरंत चिन्हित कर ताला लगा दो .....जो भि विभाग से हो ....
ज़रूरत है , जनता ,प्रतिनिधि ,को ज्ञान देकर ,कड़ा नियम बनाकर ,समस्या का विकल्प तलास्कर ,ज़रूरी कदम उठाना है ,अतः तन ,मन ,धन , से ही समर्पण भाव से ही पर्यावरण की रक्षा हो सकती है ,मै कहता हु ,दुहो पर निचोड़ो नहीं .....वरना फिल्म प्रलय २०१२ जैसा हाल हो सकता है ....होगा ....या कही कही हो रहा है ....?
आज १७ सेप्टेम्बर , दिन शुक्रवार है ,आज देव शिल्पी विस्वकर्मा जी की पूजा है , भारत में जो भि शिल्पकार है ,आज अपना कार्य बंद कर इनकी आराधना करते है ,और अपने औजार , सामान ,आदि की पूजा करते है ,
तो आज हम कसम ले की हम अपने ग्रह-गृह पृथ्वी को तराश कर ,सजा कर ,और बना कर अपने अगली पीढ़ी को उपहार में दे .......जय भारत
पर्यावरण के लिए ...
सुखी धरती करे पुकार
वृक्ष लगावो करो श्रींगार
पर्यावरण से कर लो प्यार
यही है ,मानव का घर ,संसार .....
लेखक :- एक कारगार आवाज़, आगाज़ की दरकार .....एम् .कॉम। २०१०








दया

बात वर्धमान के ज़माने की है ,वर्धमान भगवान् महावीर को कहते है ,वह अपने अन्दर की प्रेम उर्जा जीवो पर लुटाते रहते थे ,
दुखी को स्पर्श करते ,
उसी समय में एक पुरुषार्थी ,पराक्रमी ,न्यायप्रिय राजा, मृत्यु को प्राप्त होते है ,वह दुसरे लोक जाते है ,तो वहा न्याय किया जाता है , तो उन्हें आदर सम्मान के उपरी पंक्ति में नहीं रखा जाता ,
तो राजा नाराज़ हो जाते है ,कहते है मैंने धन ,बल ,सभी तरह से जीवन भर भला कार्य किया है ,फिर ये भेद भाव कैसा और क्यों ,

तब समय देव राजा को ,फिर से उसके जिए काल में ले जाते है ,
और जगह -जगह उसके मंसा ,फल ,अभिमान ,और स्वार्थ युक्त कर्म को संक्रमण कहते है ,राजा लज्जित होता है ..
क्रमशः .............





केशव अपने गुरु जनो के श्री चरणों में समर्पित करते है .......



लेखक :- ह्रदय से प्रेम -दया -परम प्रेम की तलाश में ....एम् कॉम पूर्ण ...विद्यापीठ विश्वविद्यालय ,वाराणसी

वचन और आशीर्वाद





वैसे तो वचन और आशीर्वाद अपने अपने जगह है पर ,पर कही न कही एक के आधार पर दूसरी की अहमियत है ,

बात कुरुक्षेत्र की है ,युद्ध के लिए दोनों तरफ सेनावो का तुमुल जुटाव था लडाई धर्म और अधर्म की थी ,दृश्य देखकर अर्जुन ,कृष्ण से कहते है केशव क्या मुझे यही दिन देखना रह गया है ,

कृष्ण कहते है , पार्थ युद्ध तो आखिरी विकल्प होता है ,युद्ध रणभेरिया बजने में देरी थी ,

अब अर्जुन का मोह भंग होने से अर्जुन अजय प्रतीत हो रहा था ,अर्जुन कहता है केसव मै युद्ध के लिए तत्पर हु ,

श्री कृष्ण कहते है ,पार्थ तुम कुछ भूल रहे हो , जिसके बिना तुम्हे युद्ध विजय नहीं मिल सकती ,अर्जुन कृष्ण के कथन को समझ जाते है ,और और पैदल ही विपक्षी सेना की तरफ चल पड़ते है ,दुर्योधन आदि को ससंकित अंदेसा होता है ,वह कौरव की सेना में जाकर गुरु ,क्रिपाचार्य ,द्रोणाचार्य ,और पितामह भीष्म आदि आदरणीय लोगो का आशीर्वाद लेते है ,

भिसन रक्तपात से युद्ध समाप्त होता है ,कौरव का विनाश हो जाता है ,कृष्ण गांधारी से मिलते है ,एक माँ के हृदय की ममता जाग उठती है ,वह कृष्ण को कोसने लगती है ,कहती है क्या मेरे सभी १०० पुत्र अधर्मी थे ,तुम केवल खून बहते हुए देख सकते हो अपना खून बहा नहीं सकते ,युद्ध की तरह गांधारी के सभी अभिशाप को वह श्री कृष्ण सहर्ष स्वीकार कर लेते है ,

कहते है समय आएगा तो ,अपना खून भी बहा कर दिखा दुगा ,,,माँ सरस्वती मेरा साथ देना ,,,

लेखक :- पक्षपाती , एम् कॉम २०१० विद्यापीठ ,वाराणसी ,विश्वा विद्यालय .................अन्य ड्राफ्ट

मै महान ...















वह एक मधुर भाषी था ,थोडा बहुत ज्ञानी भी था ,और सुन्दर भी ,लोगो का वाणी से उपचार भी कर देता ,लोग उसको सम्मान देते ,धन भी चढाते , धीरे धीरे उसके अन्दर गर्व गया ,सम्मान करवाने में आनंद उठाता ,गर्व बढ़ा और समाज के लोगो को अपने से तुच्छ समझने लगा ,और अपने को अलग ऊँचा समझता उसे अपने रूप ,ज्ञान ,धन का गुरूर था , परन्तु अपने ही तरह जीव को निचा समझता ,असुंदर , अपने ही तरह आँख ,नाक ,वालो ,को तुच्छ और प्रकृति के ही जीवो से मन ही मन घ्रिडा करता ,तरह तरह के विचार से भेदभाव करता ,

उसके अन्दर के पञ्च देव उसकी सोच विचार का आनंद लेते , तथा उसे सबक सिखाने को लेकर समय देव से सिफारिश करते है |समय देव ,पञ्च देव की बात मानकर उसे भविष्य के लिए दण्डित करते है ,कहते है ,जहा के लोग इसके पैर छुते थे ,अब की बार इससे कतराए गे ,यह रूप से उपरी आवरण से नाम को देखकर ही मन को फेर लेता है ,तो इसका रूप भी प्रभावित होगा ,चूँकि यह सिर्फ रूप ,मान ,सम्मान , ,का ही लोभी है अतः इसका सरीर ही प्रभावित होगा ज्ञान नहीं ,और समय के साथ उसका सरीर प्रभावित हो जाता है ,उसे कोढ़ हो जाता है , use सबक मिल गया था ,

पर आज भी ऐशे कुष्ट लोगो का ज्ञान नहीं मरा है ,एक बार मिलो जरूर कुछ मिलेगा ,आखिर वो भी तो देवो का ही पुत्र था ,पुत्र को दण्डित करते है तो कुछ सिखाने के लिए ,कल जिनको ये अलग और तिरस्कृत समझते थे ,आज ये स्वयं अभिशापित है ,और समाज के घर में ही टेढ़ी नजर के शिकार है ,


परन्तु ज्ञान ,कर्म ,और भक्ति की ताकत का मेल हर राह आसन ही नहीं ,वांछित फल भी देती है ,

भेदभाव रहित होने के लिए .....

छोटा बड़ा सभी को एक ही धरती का अन्न मिला ,हवा पानी धुप छाव का धन्न मिला ,

क्या खता हुई की कुछ ही लोगो से मन मिला ,समय देव ने रच दी रचना मिला भी तो शापित तन मिला ,,,|||||||

धीरे धीरे उसे अपनी गलतियों का अहसास होता है ,वह तप करता है ,बरसात में तो तुलसी की पत्तिया भी धुल जाती है ,तप -पश्चाताप से वह शुद्ध हो जाता है ,वह बासुदेव कृष्ण को दोस्ती की कसम देता है ,मै तेरा सखा फिर भी लोग मुझसे दूर भागते है ,

कृष्ण कहते है मित्र तुम पाटलिपुत्र जावो सूर्य उपासना के तट पर सूर्य सरोवर से लेप युक्त मिटटी बदन पर लगा कर सूर्य कृपा लो ,आतंरिक पवित्रता को वायु देव पहचान कर ,सूर्य देव तुम्हे निरोग कर देगे ,,,,|||||


चलते चलते ....अहंकार वह दानव है ,जो भूख मिटाने के बाद और भी विकराल और शराबी रूप धारण कर लेता है ,

लेखक :- एम् कॉम , २०१० पूर्ण , ,माफ़ी मंगाते हुए .....Ravi kant yadav

पूतना




कृष्ण जन्मास्टमी दो दीन का हिन्दू पर्व है ,कृष्ण जन्म ,भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी के अंत और अष्टमी के जन्म के साथ होता है , आईये जानते है ,कृष्ण के बल्यापन से जुड़े एक कहानी को ,पूतना एक महाभयंकर राक्षसी थी ,इसकी नज़र भर से हरे भरे पौधे सुख जाते और कुम्हला जाते थे ,यह किसी भी बच्चे को अपना पूत नहीं मानती थी ,इसके स्वयं के भी पुत्र नहीं थे,इसके अन्य बच्चो के नज़र भर से देख लेने से वो सुख जाते थे ,कंस की सभा में किसी ने कंस से कहा महाराज कृष्ण एक बच्चा है ,और बच्चो को नज़र भर से भस्म कर देने वाली राक्षसी त्रिपुड के जंगलो में रहती है ,
आप उशे हीरे मोती रत्न आदि सौप कर कृष्ण को मारने हेतु भेज सकते है ,
पूतना नन्द बाबा के गांव गोकुल वेश बदल कर पहुच जाती है ,घर में किसी को न देख कर घर में घुस कर वहा के आभूषण अपने कानो में लगाती है ,फिर वह कृष्ण की तरफ अन्दर ही अन्दर खौलती नजर से आक्रमद करती है ,कृष्ण खिलखिलाते रहते है ,पूतना आश्चर्य में उन्हें छु भी देती है ,तब भी कृष्ण के चेहरे की चमक बरकरार रहती है ,पूतना का मन परिवर्तित हो जाता है ,वह कृष्ण को अपना बच्चा बनाने हेतु लेकर भागने लगती है ,कृष्ण उसके मनोभाव को स्वीकार कर लेते है ,पूतना का मन नहीं भरता और वह कृष्ण को स्तन पान कराकर ही पुत्र स्वीकार करना चाहती थी , तब श्री कृष्ण उसकी लगातार गलतियों और इरादों को भाप कर उसका स्तन काट कर पूतना का विष निकाल देते है ,और उसे संतान प्राप्ति का वरदान देते है ,
शरीर से सारा विष -रक्त निकल जाने से पूतना मृत्यु को प्राप्त होती है ,........
लेखक और प्रेषक :-पूतन कावो से सावधान क्यों की तस्वीरे बनायीं जाती है ,और बोल नहीं सकती एम् .कॉम २०१० विद्यापीठ ,वाराणसी