Sunday, February 28, 2010

पिसते लोग .....और बनती चटनी भाग 1











मै न कोई बाबा हु न कोई हीरो मै एक देश भक्त हु , यदि कही कुछ दे सका और आप उसे उतारते है , तो ठीक भी है नहीं भी ,क्यों की प्यासा जल को कंठ से निचे ले जाये तो राहत में भी आह कर उठेगा ,आज मै फिर लिखने को विवस हु देश के ८० जवान सायद ७६ जिनके लिए कार्य करते थे ,उन्ही लोगो ने मार दिया या तो हम उनके लायक नहीं है ,या वो हमारे लायक नहीं है ,यदि हम शक्ति लगाते है ,तो कस्ट तो दोनों ही तरफ होगा घरो को दुःख तो होगा ही सायद गाँधी जी यही कहते थे ,हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है , या रास्ता अन्य नायको अनुसार कंटीली झाड़ियो को काट कर बनाया जा सकता है , लेकिन दुःख तो होगा ही ,रक्षक बनो भक्षक नहीं ,कभी हमारी प्रधान मंत्री कहती थी जब देख भाल नहीं कर सकते तो पैदा ही क्यों करते हो ,तब हमारे ही देश के धर्म ने कहा देख भाल तो ईश्वरकरता है ,
अपने हाथ की लकीर न देखो उसे हम बनाते है वो हमारे हाथ में है ,अपने हाथ की शक्ति देखो कर्म करो नहीं धर्म करो वो कर्म को उंगली बनकर रास्ता दिखायेगा , मै गृह मंत्री होता तो इश्तिफा देता तो देना मतलब देना मस्के बाज़ी में भी उसे स्वीकार नहीं करता सायद गृह मंत्री कही बंधे हो , कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक प्रॉब्लम है ,
यदि हम पाकिस्तानी भाई चीन से अपनापन को वो हमसे खुस नहीं है तो कश्मीर से होने वाली कमाई का कुछ हिस्सा उन्हें मिलना चाहिए याद रहे गलती सजा तब बनती है जब दुहराया जाय ,
दोस्तों देश का पैसा जा कहा रहा है ,महगाई बढाती जा रही है ,गरीब मरते जा रहे है ,किषानो की आबादी घटती जा रही है ,इसी तरह रहा तो खेती कौन करेगा ,
क्या पैसा कागज़ होता जा रहा है ,देश का पैसा यहाँ के नागरिक ,यहाँ की जमीं ,यहाँ के श्रोत ,उत्पादन ,और परिश्रम है ,हमारा देश ६०% तक किशान प्रमुख और व गरीब है ,लेकिन केवल अमीरों की चलती है ,यदि हमारी सरकार किषानो को हक़ देने में योग्य नहीं है तो चिप्स और बिस्किट की कंपनी खोल ले ,पैसा को तो हम खा पि नहीं सकते ,तो यही हो सकता है की ,सारे देश में कुछ पैदा ही नहीं होता ,यहाँ बंजर ज़मीं है ,नदी नाले या साधन नहीं है ,या तो खेत घटते जा रहे है ,और आबादी बढाती जा रही है ,और या तो ये हो सकता है जो कुछ पैदा हो रहा है ,उसे दबा लिया जा रहा है ,या बाहर भेज दिया जा रहा है ,जो दीखता है वो बिकता है ,लेकिन जो नहीं दीखता मिलता वो कीमती हो जाता है , जैसे हिरा सोना छिपे होते है ,
भारतीय मुद्रा डोल्लर के मुकाबले २० - २५ होनी चाहिए यूरो की तर्ज़ पर एशियन असीन आनी चाहिए ,
विदेसी कंपनियों को थोडा भी बढ़ावा न दो भूल गए क्या गाँधी जी ने भी कहा है ,आज महगाई की आग लगी है ,ये विदेसी कंपनिया दीमक है ,
आज १ अरब १० करोड़ वाली जनता ८० %महगे और विदेसी उत्पादन उपकरण आदि इस्तेमाल माल कर रहे है तो महगाई क्या ख़ाक जाएगी ,
जब १०-२०-२५ पैसे चलन से बाहर हो सकते है तो एक समय पर १ -२-५ रूपये भी अपनी कीमत खो दे ,या इनकी कीमत १०-२०-२५-पैसे भर रह जाये ,
विदेसी तो अपने तकनीक द्वारा भी हमारा नोट छाप कर भी अर्थ व्यवस्था को बिगाड सकते है ,
हम पहले चेत ते नहीं बाद में मरने पर चिल्लाते है ,हम अपने बने बनाये ढाचे को ही नहीं संभाल पा रहे है ,
कारण सभी जानते है ,बाहरी कारन है तो देश की सीमा ही बंद कर दो ,हमारे पास कमी नहीं नहीं है ,आज भी रेल वही पुराने अन्ग्रेज्वो के बनाये पटरी पुलों पर ही चलती है आज भी उनके बनाये bijli के खम्भे ,तार है उनके बनाये पानी के पा इप से आज ठीक पानी नहीं aata ,
अपने ही देश घर में हम जनता सुरक्षित नहीं है ,हा रस्म जरुर निभा इ जाती है ,इतने बड़े देश में समस्या है ,इसलिए अलग देश या राज्य की मांग उठती है ,अलग राज्य दे दो न ,
सरकार कहती है मै दूर दर्शी कार्य क्यों करू क्यों की उसका सारा क्रेडिट अगली सरकार या मंत्री ले लेगा , फंड आते है और फुश हो जाते है ,जनता के साधनों का मूल्य वृद्धि ,स्थान ,सरकार हमारा ही धन लेकर अपने लिए व्यक्तिगत प्रयोग करती है , जो कुछ है उसे ही संभाल नहीं पा रही है तो विकाश क्या खाक होगा ,साल में दो - तीन रेल दुर्घटना जरुरी है ,एक दो सेना के विमान क्रश हो ही जाते है , ४-६ बड़े हमले भी हो ही जाते है ,आदि आदि
यदि एक स्वतंत्र देश विकशित बनाया जा सकता है तो ,वहा के नागरिको से ,स्वतंत्र देश का कोटा ३० साल में विकशित बनाया जा सकता है ,नेतावो द्वारा नीद वो भी हराम की को त्यागना पड़ेगा ,हर समस्या विकराल होती है ,
नौकरी के लिए युवा पिरान्हा मचली बन जाते है ,
पैसे के लिए पद चाहिए ,पद के लिए पैसा चाहिए और पद है तो उसका दोहन चाहिए
६०% लोग पद का गलत प्रयोग करते है ,अपने सपथ पत्र को भूल जाते है ,
योजना व्यय के लिए नहीं लाभ ,मदद ,रोजगार ,और अर्जन दे तो सफल है ,
कुछ तो ख़तम हो जाये गा कुछ रहेगा जो रहेगा वह भी थोड़े समय के लिए ही रहेगा यही लोभ लालच है ,अर्थात जो कुछ है थोडा है ,और जो है वह भी ख़तम हो जायेगा यही लालच है ,
मुझे लगता है ये सेठ बनिया लोग सामान कम ज़हर ज्यादा बेचते है ,मिलावट तो इनके खून में ही है ,एक बार फिर हमारे पास सब कुछ है पर हम उसे संभाल क्यों नहीं पा रहे है ,

ये नेता लोग हमारे प्रतिनिधि है या हमें तास के पत्ते समझते है ,कभी कभी कह भी देते है मै अगर हरिश्चंद होता तो आज यहाँ नहीं होता ,संसद में कौवा राग क्यों होता है ,सब झूठ ही काव काँव करते है और अपने गिरेबा में झांकते तक नहीं कितना हमारा बैलेंस है ,यहाँ तक की बैलेंस भी नहीं देखते ,ज़रूरत ही नहीं है ,अकूत दौलत जो है ,देश की कौन कहे विदेश में अकूत दौलत है ,पता नहीं कैसे ये लोग देश में आग लगाकर बड़े प्रेम से होली मानते है ,ठीक भी है जनता केवल रंग देखती है ,
वाह रे भारतीय नेता काँव काँव करके बस पद चाहिए ,मेरी सरकार तो है नहीं पूरा जोर लगा दो जनता खुद ही त्राहि त्राहि कर अगली बार जीता देगी ,काँव काँव करने की क्या जरुरत है जब आप के पास मत का अधिकार है , जनता उल्लू नहीं है ,संसद के कार्य में बाधा न डालो ,
और यदि आप अपने विचारो को सुद्ध नहीं रखते है ,तो आप परेसान रहेगे परेसान करेगे और खुस भी नहीं रहेगे ,
और हां विचारो सोच को तो भगवान् भी नहीं रोक सकता हा वे सुद्ध किया जा सकता है ,
बच्चा ,वृद्ध ,महिला , पर अत्याचार हो रहा है ,भोली भली जनता पिस रही है और आनंद नेता,भ्रस्त , और पैसे वाले ले रहे है ,
भारत भ्रस्ता चार में टॉप ५ में आता है , ये हम स्वयं अपने देश को खोकला कर महगाई बढ़ाते है ,सभी का योगदान होता है तो गाँव में झोपड़ी उठती है ,
गिने चुने ही सच्चे रह गए है ,और वे भी भ्रस्ताचार के विशाल वृक्ष के निचे दम तोड़ देते है ,यहाँ लालच है ,जलन है ,रुदिवादिता है ,अनियमितता है ,अव्यवास्ता है ,लापरवाही है ,चापलूसी है ,कानून तोड़ने वालो के लिए खिलौना है , और जो नियम कानून है वो भी कछुवा चाल से चलता है ,
हमें जरुरत है परिणाम नहीं कारन को हल करने की ,एक सुरक्षा लाख नियामत की ,
आज बच्चो के लिए स्कूल है लेकिन लोग अपने बच्चो को प्राइवेट महगे शिक्षा संस्थानों में क्यों भेजना पसंद करते है ,जबकि ये लोग मनमाना फीस लेते है ,और देते क्या है निपोर चरखा ताई ,बेल्ट ,कार्ड ,और भगवान् पता न क्या क्या ,
दो पंक्तिया देश ,भाई चारे ,और अपने सम्ब्रिदीके लिए
सुखी धरती करे पुकार ,
जनता में है ,हाहाकार ,
नेतावो को है धिक्कार ,
हे भगवान् हो देश का उद्धार ,
भाई चारे का मिट ता प्यार ,
कही बन्दूक कही तलवार ,
देश तो है अपना परिवार ,
बंद करो अब ये तकरार ,
भ्रस्ता चार है बेकार ,
बंद करो अब अत्याचार ,
देश तो है अपना परिवार ,
देश तो है अपना परिवार ,
सभी पैसे व प्रसिदी के लिए जी व काम कर रहे है ,देश के लिए कौन जी रहा है ,
भोग बिलास्ता पूर्ति पश्चात इनकी आवस्यकता बढ़ जाती है ,ये दावानल है ,आग है ,
अंत में आप सुद्ध है तो आप दुर्लभ है ,और यह आत्म मंथन के ज्ञान से ही होता है ,
कोई भी ताकत की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है ,
याद रहे आप स्वयं भगवान् है ,कैसे आप के अन्दर पांच अग्नि ,वायु ,जल,धरा ,और ,आखिरी अनखोजे अनंत आकाश है ...........................................................................................................सभी को संतुलित रखो और उनका अधिकार दो ...........अभी बस और अगले बार एक खोया हुवा व्यक्ति ......म.ग.का.वि.पि। म.कॉम। वाराणसी ,२०००९-10

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